पूर्व हाईकोर्ट न्यायाधीश के. चंद्रू ने 10 अक्टूबर को चेन्नई में आयोजित एक पैनल चर्चा में कहा कि मोदी‑नेतृत्व वाली सरकार न्यायिक नियुक्तियों को प्रभावित कर रही है, जिससे राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग और कॉलेजियम प्रणाली पर फिर से सवाल उठे हैं। उनका बयान "Who Will Judge the Judges" कार्यक्रम के दौरान दिया गया, जहाँ उन्होंने 2015 में NJAC को रद्द करने के बाद सरकार ने उसी प्रणाली से अपने हितों को सुरक्षित किया, ऐसा आरोप लगाया।
NJAC vs Collegium System: ‘मोदी सरकार के पास जजों की नियुक्ति पर नियंत्रण’, पूर्व जज के आरोप से फिर उठे सवाल
केंद्रीय सरकार ने 2014 में 99वें संविधान संशोधन के माध्यम से NJAC स्थापित किया, जिसमें मुख्य न्यायाधीश, दो वरिष्ठतम न्यायाधीश, न्याय मंत्री और दो बाहरी सदस्य शामिल थे। 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने इस आयोग को असंवैधानिक घोषित किया, यह तर्क देते हुए कि यह न्यायिक स्वतंत्रता को कमजोर करता है। चंद्रू के अनुसार, अब कॉलेजियम प्रणाली के भीतर ही सरकार को प्रभाव डालने का अवसर मिला है, जिससे नियुक्तियों में पारदर्शिता घटती है।
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चंद्रू ने कॉलेजियम की गोपनीयता को "देश के सबसे बड़े रहस्यों" में से एक कहा। उन्होंने बताया कि कई बार सिफ़ारिशों पर सरकार का निर्णय देर से होता है, जिससे प्रक्रिया में देरी और जवाबदेही का प्रश्न उठता है। ओडिशा हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश एस. मुरलीधर ने भी इस बात को उजागर किया कि सरकार की भागीदारी और महिलाओं के प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दों पर स्पष्टता की कमी है।
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हाल ही में राहुल गांधी ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की, जिसमें न्यायिक नियुक्तियों की पारदर्शिता की मांग की गई। इस संदर्भ में चंद्रू ने दोहराया कि मोदी सरकार सीधे जजों की नियुक्ति में भूमिका निभा रही है, जबकि संविधान के तहत नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है और सरकार का भाग केवल सिफ़ारिशों पर विचार करना है।
कॉलेजियम प्रणाली की कार्यप्रणाली
कॉलेजियम में मुख्य न्यायाधीश और चार वरिष्ठतम सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश मिलकर जजों की सिफ़ारिश करते हैं। हाईकोर्ट के लिए मुख्य न्यायाधीश और दो वरिष्ठतम न्यायाधीश समान भूमिका निभाते हैं। इन सिफ़ारिशों को केंद्र सरकार द्वारा विचार किया जाता है और अंत में राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त किया जाता है। इसलिए यह कहना सही नहीं है कि प्रधानमंत्री सीधे जजों की नियुक्ति करता है, परन्तु सरकार की भागीदारी प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका रखती है।
भविष्य की दिशा
जज नियुक्तियों में पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर बहस जारी है। कुछ विशेषज्ञ सुझाव देते हैं कि कॉलेजियम में सुधार, जैसे चयन मानदंडों की स्पष्टता, आवश्यक हो सकती है। दूसरी ओर, NJAC के पुनरुद्धार की मांग भी सुनवाई में है, लेकिन यह अभी तक संवैधानिक चुनौती का सामना कर रहा है।
जबकि न्यायिक नियुक्तियों पर चर्चा राष्ट्रीय स्तर पर जारी है, स्थानीय समाचारों में Tamil Nadu में भारी बारिश जैसी घटनाएँ भी ध्यान आकर्षित कर रही हैं, जो दर्शाती हैं कि न्यायिक मुद्दों के साथ सामाजिक‑आर्थिक चुनौतियों का भी समकालीन महत्व है।
Sources: Prabhat Khabar, India Speak Daily, Prabhasakshi.




