संयुक्त राष्ट्र में भारत का कड़ा रुख
भारत ने कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) विरोध-प्रदर्शनों से जुड़ी एक संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार विशेषज्ञ की रिपोर्ट को पूरी तरह खारिज कर दिया है। इस मामले पर वैश्विक मंच पर कड़ी आपत्ति जताते हुए भारतीय पक्ष स्पष्ट किया गया है कि देश के नागरिकों को लोकतांत्रिक अधिकार पूरी तरह प्राप्त हैं।
युवाओं की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक अधिकार
संयुक्त राष्ट्र महासभा की तीसरी समिति के 81वें सत्र के दौरान, 'शांतिपूर्ण सभा और संगठन की स्वतंत्रता' के अधिकार पर विशेष प्रतिवेदक के साथ बातचीत हुई। इस मंच पर भारत की ओर से प्रथम सचिव अनुज स्वरूप ने भाग लिया। उन्होंने कड़ा सवाल उठाया कि यदि देश में युवाओं को अपनी बात रखने की आजादी नहीं है, तो वे राजधानी तक मार्च कर वरिष्ठ नेताओं के साथ सीधे संवाद कैसे कर रहे हैं। भारतीय संविधान देशवासियों को शांतिपूर्ण सभा, संगठन, बोलने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी देता है। इन अधिकारों के संरक्षण के लिए एक स्वतंत्र न्यायपालिका, निष्पक्ष प्रेस और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग जैसी मजबूत संस्थाएं काम करती हैं।
विशेष प्रतिवेदक की रिपोर्ट पर आपत्ति
भारतीय राजनयिक ने विशेष प्रतिवेदक जीना रोमेरो की उस रिपोर्ट पर भी गंभीर सवाल खड़े किए जिसमें दावा किया गया था कि भारत में लैंगिक न्याय और मानसिक स्वास्थ्य जैसे मुद्दों पर बोलने वालों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई होती है। इन दावों की प्रामाणिकता पर सवाल उठाते हुए यह भी बताया गया कि पिछले महीने मानवाधिकार परिषद में मानवाधिकार उच्चैक्युत ने युवा नेतृत्व वाले आंदोलनों के समाधान के लिए सीधा संवाद सबसे प्रभावी तरीका बताया था, जो शायद इस रिपोर्ट तैयार करने वालों के ध्यान से छूट गया।
परीक्षाओं और राष्ट्रहित के मुद्दों पर संवाद
सरकार की तरफ से उठाए गए कदमों का हवाला देते हुए बताया गया कि सार्वजनिक परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं को लेकर जब छात्रों ने प्रदर्शन किया, तो प्रशासन ने सीधे संवाद का रास्ता चुना। दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करते हुए प्रतियोगी परीक्षाओं की प्रणालियों में बड़े सुधार किए गए हैं। इसके अलावा, विकसित भारत यंग लीडर्स समिट जैसी पहलों के माध्यम से लाखों युवाओं ने सीधे तौर पर देश के प्रधानमंत्री के साथ राष्ट्रहित के विषयों पर चर्चा की है।
Sources: AajTak, Hindustan, Amar Ujala.




